सफ़र के दरमियाँ दो रस्ते मिले
मिल न पाए, बस थे कुछ ऐसे गिले
कही पत्थर, कही कंकड़
कही आंधी धूल धक्कड़
कही पंख तो कही शूल
कही मुरझाये फूल
थे यह सब उन रास्तो पे गिरे
जो थे फासले दर्मिया पर मिल न सके
है फलसफे इन रहो के मोड़ो भरे
पड़ी है दरारे कही पत्ते झडे
कही खड्डे कही चक्कर
कही राह चलते फक्कड़
कही जो हवाओ ने पकड़ी है तूल
चौराहे में आ बैठी एक भूल
पथिक है यह सब इन रास्तो के छोटे बड़े
कही है ये चलते कही है थक्क के खड़े
मंजिले है कुछ दूर हाथ बांधे खड़े
हो जैसे ज़िन्दगी के आखरी पल कुछ बचे
बैठेंगी यह बस सांस ले कर
जी जाएँगी उन् रास्तो से मिलकर
है जिन पर थोड़ी सी धूल
कही कुछ मट्टी कुछ फूल
बस युही चलते रहेंगे यह सिल-सिले
मंजिल थी एक, फिर भी मिल न सके |
(c) Vivek Misra